दुनिया भर में तेजी से बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के बीच अब पारंपरिक बड़े परमाणु संयंत्रों की जगह छोटे, सुरक्षित और कम खर्चीले स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) चर्चा में हैं। ये ऐसे आधुनिक न्यूक्लियर रिएक्टर हैं जिनसे कम जगह में अपेक्षाकृत जल्दी बिजली पैदा की जा सकती है। रूस इस तकनीक में अग्रणी है और अब भारत में भी SMR लगाने की इच्छा जता चुका है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हालिया भारत यात्रा के दौरान इसे लेकर बातचीत हुई, जिससे संकेत मिला है कि भारत भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा के लिए इस तकनीक को अपनाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
भारत-रूस के बीच SMR पर बातचीत
केंद्र सरकार ने संसद को जानकारी दी है कि रूस की सरकारी परमाणु कंपनी रोसाटॉम (Rosatom) के साथ SMR को लेकर बातचीत जारी है।
परमाणु ऊर्जा विभाग और रोसाटॉम के बीच हुई बैठकों में—
- परमाणु ईंधन चक्र में सहयोग
- बड़े व छोटे परमाणु प्रोजेक्ट्स का विकास
- SMR के स्वदेशीकरण पर जोर
जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई है। भारत का फोकस साफ है कि तकनीक केवल आयात न हो बल्कि देश में ही SMR का निर्माण करके आत्मनिर्भरता बढ़ाई जा सके।
SMR क्या होते हैं?
स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) ऐसे न्यूक्लियर रिएक्टर होते हैं जिनकी उत्पादन क्षमता 300 मेगावाट या उससे कम होती है। इसके मुकाबले पारंपरिक रिएक्टरों की क्षमता आमतौर पर 1000 मेगावाट से ज्यादा होती है।
SMR को फैक्ट्री में पहले से तैयार किया जाता है और फिर जहाज या ट्रक के जरिए साइट पर लाकर असेंबल किया जाता है। इससे निर्माण में देरी कम होती है और संयंत्र तैयार करने में केवल 3-5 साल लगते हैं। ये रिएक्टर नाभिकीय विखंडन से गर्मी पैदा करते हैं, जिससे भाप बनती है और टर्बाइन घुमाकर बिजली उत्पन्न होती है।
रूस ने दुनिया का पहला फ्लोटिंग SMR “अकादेमिक लोमोनोसोव” वर्ष 2020 में शुरू किया था।
रूस भारत में SMR क्यों लगाना चाहता है?
भारत और रूस के बीच परमाणु सहयोग दशकों पुराना है। कुडनकुलम संयंत्र इसका बड़ा उदाहरण है।
रूस भारत को—
- तकनीक ट्रांसफर
- संयुक्त उत्पादन
- स्थानीयकरण
की पेशकश कर रहा है।
भारत में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन बड़े परमाणु संयंत्र महंगे होते हैं और बनने में बहुत वक्त लगता है। SMR कम जमीन में लग जाते हैं — करीब 15 से 17 हेक्टेयर में — और तेजी से चालू हो सकते हैं। साथ ही भारत के पास मौजूद थोरियम संसाधन स्वदेशी SMR को विकसित करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
SMR और पारंपरिक रिएक्टर में अंतर
पारंपरिक रिएक्टर
- क्षमता: 1000 मेगावाट से अधिक
- लागत: अरबों डॉलर
- निर्माण समय: 8–12 वर्ष
- सुरक्षा: एक्टिव कूलिंग सिस्टम पर निर्भर
- जगह: बहुत ज्यादा
SMR
- क्षमता: 300 मेगावाट तक
- लागत: तुलनात्मक रूप से कम
- निर्माण समय: 3–5 वर्ष
- सुरक्षा: पैसिव सिस्टम, बिना बिजली भी दुर्घटना रोकने में सक्षम
- जगह: कम
इनकी मॉड्यूलर डिजाइन के कारण जरूरत बढ़ने पर कई यूनिट जोड़कर क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
SMR की लागत कितनी है?
अभी तकनीक विकास के दौर में है लेकिन अनुमान के मुताबिक—
- 114 मेगावाट SMR की लागत लगभग $2,653 प्रति किलोवाट है।
- वहीं, पारंपरिक रिएक्टर की लागत करीब $4,764 प्रति किलोवाट तक जाती है।
भारत में अनुमान है कि ₹20,000 करोड़ में करीब 5 स्वदेशी SMR लगाए जा सकते हैं, और बड़े पैमाने पर निर्माण शुरू होने पर यह लागत और घट सकती है।
दुनिया में SMR की स्थिति
फिलहाल—
- 127 SMR डिजाइन वैश्विक स्तर पर विकसित हो रहे हैं।
- 7 प्रोजेक्ट ऑपरेशनल या निर्माणाधीन हैं।
- रूस और चीन में SMR चालू हैं।
- अर्जेंटीना, अमेरिका, फ्रांस समेत 18 देशों में 80 से ज्यादा SMR डिजाइन रिसर्च चरण में हैं।
भारत को SMR से क्या फायदे होंगे?
SMR से भारत को—
- कार्बन-मुक्त बिजली
- दूर-दराज और सीमावर्ती क्षेत्रों में ऊर्जा सप्लाई
- तेजी से नई क्षमता जोड़ने की सुविधा
- फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता में कमी
- ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता
जैसे लाभ मिलेंगे।
SMR से जुड़ी चुनौतियां
- शुरुआत में निवेश ज्यादा होता है
- IAEA और घरेलू नियामक मंजूरी जरूरी
- सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन
भारत इन चुनौतियों से निपटने के लिए स्वदेशी रिसर्च और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ा रहा है।
भारत की वर्तमान परमाणु स्थिति
भारत के पास फिलहाल—
- 24 चालू रिएक्टर – 7,943 मेगावाट
- 6 निर्माणाधीन यूनिट – 4,768 मेगावाट
- 10 प्रस्तावित रिएक्टर – लगभग 7 गीगावाट
बड़े संयंत्रों के साथ SMR तेज़ी से इंस्टॉल होने वाला सपोर्ट सिस्टम बन सकते हैं।
निष्कर्ष
रूस के साथ संभावित SMR सहयोग भारत को ऊर्जा क्षेत्र में नई दिशा दे सकता है। कम लागत, अधिक सुरक्षा और तेज़ निर्माण समय के चलते SMR तकनीक भारत के ऊर्जा भविष्य की रीढ़ साबित हो सकती है। अगर बातचीत आगे बढ़ती है, तो आने वाले वर्षों में भारत में एक नई न्यूक्लियर एनर्जी क्रांति दिखाई दे सकती है। 🚀
